कुछ यादें और कुछ सिसकियाँ जो अँधेरे और तन्हाई में जाने कहाँ खो गयीं
आधी सदी गुज़र जाने के बाद और दो तिहाई उम्र काटने के बाद, अब कुछ लेखा जोखा, कुछ ज़िन्दगी के पहलू फिर से घूम कर तलाशा:
मुद्दा : तबादले
हाय यह घुम्मकड़ी नौकरी .....
हर दूसरे साल तबादलों के खातिर,
शहर और आशियाने बदल जाते हैं|
हम अपने ही शहर में दो साल बाद,
फिर मुहाजिर हो जाते हैं |
मुद्दा : कवि बनने की इच्छा थी कभी
यूँ तो कोई खास ख्वाहिश नहीं
जिसके पूरे ना होने का गम हो।
पर कभी कभी एक सदी पहले भी
मुहब्बत इज़हार ना करने का अफसोस आज भी होता है।
ज़िंदगी के बही खाते में
उन आंसुओं को कभी तौला ही नहीं ग़ालिब।
जो मुस्कुराहटों के साये में
अपना वजूद ही खो बैठे|
मुहब्बत ज़रूर करनी चाहिए।
कामयाब हुए तो वो आपकी, आप उनके।
और नाकामयाब हुए तो
दो शायर तो पैदा हो ही जायेंगे।
बेइंतहा मुहब्बत
हाथ में हीरे सा होता है।
जब तक हाथ से छूटे नहीं,
अहसास ही नहीं होता।
मुद्दा : खुद से मुहब्बत भी ज़रूरी है
इजाज़त हो तो, ऐ ज़िंदगी..
कुछ लम्हें और बरबाद कर लूं,
खुद के साथ कुछ और वक़्त गुज़ार लूँ।
फ़िलहाल की कद्र कुछ कम है,
इसलिए गुज़रे पल
और गंवाये मौके याद आते हैं आजकल।
अकेलेपन से कभी खौफ नहीं रहा है मोहतरमा।
आप को क्या बताएं किस कदर,
किस हद तक गुज़र चुके हैं तन्हाई की तलाश में।
ज़रा खुद के संग कुछ वक़्त और गुज़ार लो।
क्या पता, दुनिया देखने का नज़रिया
शायद फिर बदल जाए।
पांच मिनट और सो लूं फिर उठ जाऊँगा...
30 साल हो गये देखते देखते
और पांच मिनट बाद उठने का प्रयास
अब भी जारी है।
मुद्दा : कुछ सबक तो ठोकर खाकर ही सीखते हैं
वक़्त का तकाज़ा है जनाब,
उम्र से तजुर्बा है,
और तजुर्बे से गैरों में इज़ाफा।
उन रातों को याद करो
जब नींद उड़ी हुई होती थी।
और वज़ह थी इंतज़ार, उम्मीद या फिर दहशत
सुकून के दिन में भी पाँव ज़मीन पर जमे रहेंगे।
मुद्दा : जब रोमांस ही रोमांच था
हर दर्द ए दिल की दास्ताँ बयां नहीं होती ग़ालिब।
अक्सर मुहब्बत
गुमनामी के अंधेरे में,
खामोशी अख्तियार कर लिया करती है।
आप जो मिलते नहीं,
रोज़ मुहब्बत में थोड़ा इज़ाफा और हो जाता है।
फर्क़ इतना है कि तब इज़हार किया नहीं
और अब कर सकते नहीं।
चार दिन की ज़िंदगी
तीन दिन की जवानी
एक निकल गई तुमसे नज़रे चुराते हुए
बाकी दो तुम्हें भुलाते हुए।
आशिकों की जमात छोड़ दिया
..तुमने खून के आंसू टपकाते हुए ऐ बेरहम
ज़िंदगी उसके साथ गुज़ारने चली गई
जिसे तुम्हारे नाम का इल्म तक ना था |
पूछती है वो कि मेरी ग़ज़ल की तनहाई
किसे पुकारती है।
इंतज़ार में हूँ कि मेरी खामोशी की आवाज़ में,
कभी तो उसे जवाब का एहसास होगा।
ज़रा मुड़कर तुमने
सिर्फ एक बार देखा तो होता।
जाने कितने अरसों तक मैं वहीं
तुम्हें खड़ा इंतज़ार करता हुआ मिलता।
सात समंदर पार से आती
तुम्हारी खिलखिलाती आवाज़ में
मुझे छुपी सिसकियाँ सुनाई देती हैं।
कोई ख्वाहिश पूरी होनी बाकी है या वहम है।
आयी थी बचपन में,
खुद को हवा का हल्का झोंका बताकर।
चली गई दिल में तूफान छोड़ कर।
जवानी निकल गई, तूफ़ान आज भी थमा नहीं
तुम इतनी खूबसूरत कभी ना हो पायी होगी
जितनी मेरी यादों में होती जा रही हो
अर्नब गांगुली,
कार्यालय उप नारकोटिक्स आयुक्त,
लखनऊ
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